ब्लॉग: चीन का सही इतिहास पढ़ाएं

गत 17 मार्च को चीन की संसद ने पूर्ण बहुमत से शी जिनपिंग को आजीवन राष्ट्रपति बने रहने के प्रस्ताव को पारित कर दिया है। इस खबर से सारी दुनिया में तहलका मच गया है और भारत में भी रक्षा विशेषज्ञों में चिंता की लहर दौड़ गई है, क्योंकि शी एक कट्टरवादी नेता माने जाते हैं और हाल में उनके कुछ ऐसे बयान आए हैं जो भारत के लिए चिंताजनक हैं।

यह भी खबर आई है कि शी जिनपिंग ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि वह चीन की एक इंच जमीन भी किसी दूसरे को नहीं लेने देंगे। जो लोग चीन के इतिहास से अवगत हैं वे जानते हैं कि जब चीन के नेता इस तरह का बयान देते हैं तो उसका अर्थ है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में अतिक्रमण करके दूसरे देशों की जमीन को हड़पने का प्रयास करेंगे।

शी एक कट्टरवादी नेता माने जाते हैं और यह समझा जाता है कि वे अपने मनसूबों को मूर्तरूप देने के लिए कुछ भी करने पर आमादा हो जाते हैं। उन्होंने यह घोषणा की है कि वे 2035 तक चीन को सुरक्षा और आर्थिक संपन्नता के मामले में अमेरिका के बराबर शक्तिशाली राष्ट्र बना देंगे। इसके लिए जो भी संभव होगा वे अवश्य करेंगे। खबर है कि भारत की अनदेखी करके चीन ने डोकलाम में फिर से सड़के बनाना शुरू कर दिया है।

जब इस मामले में मीडियाकर्मियों ने हाल में देहरादून में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण से पूछा तो उन्होंने कहा कि चीन के रुख को लेकर भारत पूरी तरह सावधान है और हर परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार है। उन्होंने दृढ़ता से कहा कि हम अपनी क्षेत्रीय अखंडता को बरकरार रखेंगे। सेना हर परिस्थिति के लिए तैयार है। सेना के तीनों अंगों थल सेना, वायुसेना और नौसना का आधुनिकीकरण किया जा रहा है।

तीनों अंगों को पूरे अधिकार दिए गए हैं। चीन में सरकार से अधिक पार्टी का महत्व होता है और पार्टी में भी सबसे अधिक महत्वपूर्ण पद महासचिव का होता है। सच कहा जाए तो सभी साम्यवादी देशों में महासचिव का पद सर्वोच्च होता है। शी को पहले कम्युनिस्ट पार्टी का महासचिव बनाया गया और फिर चीन का राष्ट्रपति बनाया गया।

देंग के समय में यह प्रावधान था कि कोई व्यक्ति दो बार से अधिक राष्ट्रपति नहीं हो सकता है, परंतु इस बार संविधान में संशोधन कर इस प्रावधान को निकाल दिया और शी को एक तरह से आजीवन देश का राष्ट्रपति घोषित कर दिया गया। शी के बारे में विदेशों में आम धारणा है कि उनका रवैया पूरी तरह तानाशाही है। उनके कहने और करने में बहुत अंतर है।

वे हंसकर पड़ोसी नेताओं से बात करते हैं और भीतर ही भीतर सेना को अतिक्रमण करने के लिए तैयार रहने को कहते हैं। शी ने ‘वन बेल्ट-वन रोड' की योजना बनाई है जिससे इस योजना के अंतर्गत दुनिया के अधिकांश क्षेत्रों को जोड़ा जाएगा और एक व्यापारिक मार्ग विकसित किया जाएगा। यह व्यापारिक मार्ग जल और थल दोनों मार्गों से होगा।

इस व्यापारिक मार्ग को विकसित करने में चीन भारी वित्तीय व्यवस्था करने के लिए तैयार है। शी का मानना है कि जब तक चीन आर्थिक मामले में अमेरिका की तरह विकसित देश नहीं हो जाता है, वह सबसे मजबूत राष्ट्र के रूप में नहीं उभर पाएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि शी माओ-त्से-तुंग की तरह ही तानाशाह होंगे।

माओ-त्से-तुंग ने अपनी सनक को पूरा करने के लिए चीन के लाखों लोगों को विभिन्न परियोजनाओं में स्वाहा कर दिया था। जब माओ-त्से-तुंग के समय में साम्यवादी पार्टी चांग काई सेक की पार्टी से चीन की मुख्य भूमि पर लड़ाई कर रही थी उस समय माओ-त्से-तुंग ने बिना सोचे समझे लाखों लोगों को मौत के घाट उतरवा दिया था।

यही नहीं माओ-त्से-तुंग ने ‘कल्चरल रिवोल्यूशन' के समय अपनी सनक के चलते चीन के अनगिनत निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतरवा दिया था। माओ-त्से-तुंग के बाद जब ‘देंग' देश के प्रधान हुए तब उन्होंने आर्थिक सुधारों की नींव रखी और सार्वजनिक रूप से कहा कि यदि चीन को दुनिया के अन्य विकसित देशों का मुकाबला करना है तो उदारवादी रवैया अपनाना होगा और उन्होंने इस सिलसिले में चीन के समुद्री तट पर अनगिनत कारखाने लगवाए जिनमें सस्ती उपभोक्ता वस्तुएं बनने लगी जो पूरे संसार में छा गई।

दुर्भाग्य यह हुआ कि आज भारत में भी चीनी सामान छाया हुआ है जो भारत में बने सामान की तुलना में बहुत सस्ता है और हम चाहकर भी लोगों में देशभक्ति की भावना पैदा नहीं कर सकते हैं। क्योंकि हर उपभोक्ता सस्ती वस्तुएं चाहता है। सच कहा जाए तो ‘माओ-त्से-तुंग' की तानाशाही से उबकर चीन की जनता ने देंग के आर्थिक और राजनीतिक सिद्वांतों का अनुकरण उचित समझा। चीन में श्रम बहुत सस्ता था और वहां की तकनीक भी बहुत विकसित थी, इसलिए दुनिया के सभी संपन्न देशों ने वहां अपने कारखाने खोले और तैयार माल को संसार के अन्य देशों को निर्यात किया।

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप का कहना है कि अमेरिका की तत्कालीन कंपनियों ने चीन में अपने कारखाने खोलकर भयानक भूल की। जब हम राजनीति की बात करते हैं तब हमें यह ज्ञात होता है कि आज की तारीख में हमारा चीन से बड़ा कोई शत्रु नहीं है। उसने पाकिस्तान से हाथ मिला लिए हैं और नेपाल में भी सरकार में घुसपैठ कर रहा है। पीछे मुड़कर देखने से लगता है कि माओ-त्से-तुंग हमेशा भारत को घृणा की दृष्टि से देखते थे।

आजादी के बाद जब भारत कॉमनवेल्थ का सदस्य हुआ तब माओ-त्से-तुंग कहा करते थे कि यह एक नकली आजादी है, एक आजाद देश काॅमनवेल्थ का सदस्य कैसे हो सकता है। पंडित नेहरू ने चीन के इतिहास को सही परिप्रेक्ष्य में कभी नहीं समझा। उनका मानना था कि जिस तरह भारत अंग्रेजों का उपनिवेश था उसी तरह चीन भी पश्चिमी देशों का उपनिवेश था और जब दोनों देशों को आजादी मिल जाएगी तो वे अभिन्न मित्र हो जाएंगे और वे एशियाई देशों के विकास में सहयोग करेंगे, परंतु दुर्भाग्यवश उनका सोचना सही नहीं था और इसी कारण हमने तिब्बत को खो दिया।

भारत के स्कूलों को माध्यमिक शिक्षा के स्तर पर ब्रिटिश इतिहास तो पढ़ाया जाता है, परंतु चीन का इतिहास नहीं। समय आ गया है जब हम अपने बच्चों को चीन का इतिहास पढ़ाएं और बताएं कि चीन हमेशा विस्तारवादी देश रहा है। अतः रक्षा के मामले में पूरी सतर्कता की आवश्यकता है। भारत चीन की सरकार से, खासकर उसके राष्ट्रपति शी से सौहार्दपूर्ण रिश्ते कायम करने के पूरे प्रयास कर रहा है, इसमें कितनी सफलता मिलेगी, कहना कठिन है, फिर भी हमें हर तरह से सतर्क रहने की आवश्यकता है।

(नोट- यह आर्टिकल लेखक डॉ गौरीशंकर राजहंस द्वारा लिखा गया है)

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ब्लॉग: चीन का सही इतिहास पढ़ाएं ब्लॉग: चीन का सही इतिहास पढ़ाएं Reviewed by Rkz Theatre Team on March 30, 2018 Rating: 5

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