अभिनेता रजत कपूर से थिएटर को लेकर एक खास मुलाकात, जानें इस इंटरव्यू में हुई खास बातें

हर तरह का थिएटर होना चाहिए और हर वक्त में होना चाहिए। ये नहीं कि जब आपकी पॉलिसी अच्छी हो तभी होना चाहिए या खराब हो तभी होना चाहिए। लेकिन आप जो भी कुछ करते हैं आर्ट में, तो आपके आसपास जो हो रहा है वो सब आपके काम का हिस्सा हो जाता है और वैसे निकलता है जैसे आप चाहते हैं।

जाने-माने फिल्म अभिनेता और निर्देशक रजत कपूर का थिएटर से लंबा जुड़ाव रहा है। फिल्मों ने उन्हें व्यापक पहचान जरूर दी, लेकिन रंगमंच का रोमांच उनके लिए कभी कम नहीं हुआ। वह मानते हैं कि फिल्में टिकाऊ होती हैं, इंसान की मौत के बाद भी उसकी फिल्में देखी जा सकती हैं, जबकि थिएटर हर शो के साथ ही मर जाता है। बावजूद इसके, दर्शकों की प्रत्यक्ष भागीदारी इसके महत्व को कम नहीं होने देती। फिल्म और थिएटर के विभिन्न पहलुओं पर उनसे अमितेश कुमार ने बातचीत की।

सवाल- आप सिनेमा में बतौर अभिनेता और निर्देशक स्थापित हैं। थिएटर में मेहनत भी अधिक लगती है और पैसा भी कम है। फिर भी आप थिएटर कर रहे हैं। वह क्या चीज है जो आपको थिएटर से जोड़े हुए है?

जवाब- ये एक लव अफेयर है। लोग ये सवाल भी मुझसे पूछते हैं कि आप क्यों फिल्म बनाना चाहते हैं। ये इतना मुश्किल काम है, थिएटर से कहीं ज्यादा। थिएटर तो आप कर ही लेते हैं कुछ पैसे जुगाड़ कर आप कर सकते हैं। सिनेमा के लिए दो करोड़, चार करोड़ चाहिए। बात बिल्कुल सही है, लेकिन इसके बावजूद करता रहता हूं, जूझता रहता हूं। इसका जवाब मुझे यही मिला है कि इट्स अ सिकनेस। ये बीमारी है जिसकी वजह से लगा हुआ हूं। और इट्स आल्सो ए ग्रेट जॉय। थिएटर और सिनेमा दो अलग तरह की चीजें हैं। दोनों का अलग आनंद है। थिएटर के साथ एक बात मुझे ये लगती है कि हर शो के बाद यह मर जाता है। सिनेमा के साथ ऐसा नहीं है। आपकी मौत के बीस-पचीस साल बाद भी कोई पिक्चर देख सकता है। तो पिक्चर रहती है, जाती नहीं है। थिएटर आज है, कल नहीं है। लेकिन दर्शकों का सामने रहना, दर्शकों की प्रतिक्रिया, लाइवनेस, इसके स्तर। इट्स अ ग्रेट जॉय। और इसको करने की प्रक्रिया बहुत अलग है, नाटक तैयार करना भी आनंद है। इसलिए थिएटर नहीं कर रहा हूं कि कोई इसमें समाज सेवा है। आई मेक फिल्म्स एंड आई डू थिएटर बिकॉज इट्स एबसोल्यूट पैशन। मेरा जुनून है ये।

सवाल- आज की जो सामाजिक- राजनीतिक परिस्थिति है इसमें किस तरह का थिएटर होना चाहिए?

जवाब- हर तरह का थिएटर होना चाहिए और हर वक्त में होना चाहिए। ये नहीं है कि जब आपकी पॉलिसी अच्छी हो तभी होना चाहिए या खराब हो तभी होना चाहिए। लेकिन आप जो भी कुछ करते हैं आर्ट में, तो आपके चारों ओर जो घट रहा है, उस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। आप किताब भी लिख रहे हैं तो आपके आसपास जो हो रहा है या आपके जीवन में जो हुआ है, वो सब आपके काम का हिस्सा हो जाता है और वैसे निकलता है जैसा आप चाहते हैं।

सवाल- आप खुद अभिनेता हैं, लेकिन अपने नाटकों में आप एक्ट नहीं करते। तो जब आप अभिनेताओं को देखते हैं तो इंटरफेयर भी करते हैं?

जवाब- ये एक संवाद है, ये एक टेनिस मैच है। अभिनेता ने मुझे बॉल फेंकी, मैंने उसको बॉल फेंकी, फिर उसने मुझे फेंकी... तो एक रैली की तरह है। अभिनेता कैरेक्टर करते हुए कहता है कि इसको ऐसे करें तो कैसा रहे। फिर वो प्रयास करता है। तो निर्देशक कहता है वो वाला अच्छा था, ये वाला अच्छा नहीं है। तो ये सम्मिलित प्रयास हो जाता है। मेरा काम असल में संपादन का है कि ये ठीक है, ये ठीक नहीं है।

सवाल- इस प्रॉसेस में थिंकिंग एक्टर का होना कितना जरूरी है?

जवाब- थिंकिंग और नॉन थिंकिंग दोनों चलेगा मेरे को। थिंकिंग एक्टर से कभी-कभी नुकसान भी हो जाता है क्योंकि थिंकिंग एक्टर कभी-कभी ज्यादा सोचते हैं। मुझे ऐसे एक्टर चाहिए जो स्पॉन्टेनस हो। उसमें हिम्मत बहुत चाहिए क्योंकि आपको कोई डायरेक्शन दे नहीं रहा, कोई टेक्स्ट भी नहीं है आपके पास काम करने के लिए। तो ये आपके संवेग के साथ जाता है। इसमें अच्छे-बुरे की बात नहीं है, लेकिन आपको अलग तरह का एक्टर चाहिए जो टेक्स्ट पर काम कर सके।
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अभिनेता रजत कपूर से थिएटर को लेकर एक खास मुलाकात, जानें इस इंटरव्यू में हुई खास बातें  अभिनेता रजत कपूर से थिएटर को लेकर एक खास मुलाकात, जानें इस इंटरव्यू में हुई खास बातें Reviewed by Rkz Theatre Team on April 28, 2018 Rating: 5

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