ब्लॉग: प्रतियोगिता तो घोड़ों की होती है, कलाकारों की नहीं !

ये लाइन कहीं पढ़ी थी। पर साहब थिएटर में इन प्रतियोगिताओं ने बड़ा बेड़ा ग़र्क किया है। मैं स्कूल में पढ़ाता हूँ ,तो आजकल स्कूलों में भी नुक्कड़ नाटक होने शुरू हो गए है। अब जिन स्कूलों में नुक्कड़ नाटक होते हैं ,वो नुक्कड़ पर कभी नहीं जाते ,ख़ाली प्रतियोगिता में जाते हैं। और अगर prize न मिले तो बच्चों और टीचर दोनों को गालियाँ पड़ती हैं। ऐसी ही तमाम प्रतियोगिताएं कॉलेजों में भी होती रहती हैं। इसमें विद्यार्थी उन्हीं कॉलेजों में जाते हैं ,जिनमें प्राइज ज़्यादा होता है। उनको कह दो कि जिसे तुम नुक्कड़ नाटक कह रहे हो ,उसे कभी नुक्कड़ पर भी कर दो ,तो लड़कों को पेचिस लग जायेगी और लड़कियाँ हीट स्ट्रोक से मर जायेंगी।

महाविद्यालयों का सारा रंगमंच इन्हीं इनामी कूपन वाली प्रतियोगिताओं और पैसे के चारों तरफ़ घूमता रहता है। उसके अलावा न कभी वो ,जनता के बीच नुक्कड़ नाटक लेकर जाते हैं न मंच नाटक। कुछ लोग इन्हीं यूथ फेस्टिवल्स से जीविका चला रहे हैं। वो साल भर सोए रहते हैं और युथ फेस्टिवल्स के समय ,कई कॉलेजों में एक साथ नाटक करवाने का ठेका ले लेते हैं।

उसके बाद शुरू होता है असली खेल, यानि साम दाम दंड भेद ,जोड़ तोड़ से जीतने की कोशिशें। सो केंद्र में आ गया केंद्रे। मतलब पैसा। ऐसी ही कुछ प्रतियोगिता शौक़िया-प्रोफेशनल थिएटर में भी होती रहती हैं। जिसमें ज़्यादातर आयोजकों का मक़सद कुछ और ही होता है। वहाँ भी यही छीछालेदर। ये नहीं मिला ,वो नहीं हुआ। दे जूतमपैजार।

पहले मुझे लगा कि ओलम्पिक में भी प्रतियोगिताएं होंगी ,वज़न और उमर के हिसाब से कुश्ती और कबड्डी होगी। बड़ा मज़ा आएगा। कौन सही निशाना लगाता है ,कौन ग़लत ,ये चेक किया जाएगा। या हो सकता है कोई सौंदर्य प्रतियोगिता ही करा दी जाए ,जैसे कई बार ड्रामा स्कूल्स के ऑडिशन में हुआ करती है ,जहां रैफरी कहता है कि मैं फाइनल में पहुंचा दूँगा, पर प्रैक्टिस अकेले में करनी पड़ेगी। ख़ैर ,बाद में पता चला कि ये तो जात-बिरादरी के लोगों का पारिवारिक होली मिलन समारोह है।

ख़ैर ये तो हुआ मज़ाक। पर इन प्रतियोगिताओं से मुझे तो रंगमंच का कुछ भला होता नहीं दीखता। बल्कि नुक़सान ही होता है, collaboration की बजाय ,isolation ही बढ़ता है। नाटक लोगों को जोड़ने के लिए होता है ,न कि तोड़ने के लिए ।आप अगर ऐसे में किसी अखाड़े में बैक स्टेज चले जाएं तो ऐसी नकारात्मक ऊर्जा दिखाई देती है ,कि आपको वहाँ से भाग जाने का मन करे । यहाँ भी जोड़ तोड़ के तमाम किस्से सुने हैं।

पर कोई करे भी क्या, हम ऐसे ही हो चुके हैं। किसी से कहो कि चलो मिल कर कुछ करते हैं, तो उसका व्यापारी और जासूसी दिमाग़ ,चलने लगता है। और जैसे ही कहो ईनाम। तो सब तैयार। यही है वो पूँजीवादी संरचना ,जिसके बारे में कुछ लोग चीख़ चीख़ कर हलकान हो गए हैं, और बाक़ी बापू का बहरा वाला बन्दर बने बैठे हैं। प्रतियोगिता की जड़ ही पूँजी है। प्रतियोगिता की बजाए ,सामूहिकता पर ज़ोर देना चाहिए ,तभी कुछ भला हो सकता है। मल्लब बोले तो समाजवाद।

(ये ब्लॉग आरकेजेड टीम द्वारा प्रकाशित नहीं है। ये विचार लेखक के खुद हैं और फोटो प्रतीकात्मक है)
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ब्लॉग: प्रतियोगिता तो घोड़ों की होती है, कलाकारों की नहीं ! ब्लॉग: प्रतियोगिता तो घोड़ों की होती है, कलाकारों की नहीं ! Reviewed by Rkz Theatre Team on May 29, 2018 Rating: 5

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