Blog: तीखे तंज वाला वह मस्त बुड्ढा

हिमाचल प्रदेश के कसौली में होने वाला खुशवंत सिंह लिटरेरी फेस्टिवल (केएसएलएफ) इस बार लंदन के नेहरू सेंटर में हो रहा है। इन दिनों चहुंओर उफनाता तथाकथित राष्ट्रवाद ही वहां चर्चा का विषय है। खुशवंत सिंह अपने वक्त में जितने चर्चित उतने ही निंदित व्यक्ति हुआ करते थे। डर्टी ओल्डमैन कहलाने वाले खुशवंत सिंह में ऐसा कौन सा सार्थक तत्व है, जिसे रेखांकित करने के लिए लंदन लिटफेस्ट का आयोजन पहली बार किसी भारतीय लेखक के नाम पर हो रहा है, इस सवाल पर सोचते हुए मुझे अपने गांव के करीबी कस्बे सैदपुर की याद आई। पिछड़े हुए पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में सैदपुर इतनी पिछड़ी जगह है कि वहां के लोग इस बात पर गर्व करते हैं कि एक बार संसद में सैदपुर को ‘दूसरी चंबल घाटी’ कहा गया था। कारण था, अस्सी-नब्बे के दशक में वहां थोक के भाव हुई जातीय हत्याएं।

मैं तब हाईस्कूल का छात्र था और मुझे चाय की दुकान पर बैठकर बनारस से आने वाला ‘आज’ अखबार पढ़ने का चस्का लग चुका था। उस दुकान पर कई पियक्कड़ भी बैठते थे जो एक स्थानीय माफिया के ठेके पर मिलने वाली नकली शराब से बहुत परेशान थे। मैंने एक दिन अखबार में एक बुड्ढे सरदार का बनाया नारा पढ़ा- ‘व्हिस्की दो, सोडा दो, वरना गद्दी छोड़ दो।’ वह मांग कर रहा था कि भारत के शराबियों को शुद्ध व्हिस्की और कहीं भी बैठकर आराम से पीने की आजादी मिलनी चाहिए। यह ऐसी क्रांतिकारी मांग थी जिसकी कल्पना छिपकर पीने के आदी अपराधबोध के मारे शराबी कर ही नहीं सकते थे। बात जायज थी कि अगर सरकार शराब बेचती है तो घटिया शराब पीकर असमय मरने के बजाय शराब की शुद्धता सुनिश्चित करने की मांग सरकार से क्यों नहीं की जा सकती/

खुशवंत सिंह नाम का यह बुड्ढा सरदार एक बल्ब के भीतर हाथ में कलम लिए बैठा रहता था। उसके बगल में किताबों का ढेर था, एक नंगी औरत की तस्वीर थी और प्याले के साथ एक शराब की बोतल थी। उसके कॉलम का नाम था, ‘ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर’, जो अपने मूल रूप ‘विद मैलिस टुवर्ड्स वन एंड ऑल’ का अंग्रेजी से बहुत खराब अनुवाद हुआ करता था। उस उलझी हुई भाषा में इतना समझ आता था कि यह आदमी मेरे आसपास के लोगों की तरह पाखंडी नहीं है। वह मरने के बाद भी लोगों को नहीं बख्शता। श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए भी बड़े-बड़े नेताओं के बारे में बता देता था कि फलाने जी कितने बड़े लालची, कामुक, कंजूस या डरपोक थे। भारतीय औरतों के बारे में वह आश्चर्य प्रकट करता था कि आधा दर्जन बच्चे पैदा करने के बाद भी उन्हें पता नहीं होता कि सेक्स का आनंद क्या होता है।

सबसे ऊपर उसके दो चरित्र थे संता और बंता, जो अपना ही मजाक बनाया करते थे। चूंकि मैं दिखावे और नकली मर्यादा वाले समाज की घुटन झेलते हुए बड़ा हुआ इसलिए खुशवंत सिंह दिमाग में फंसे रह गए। मैं उनको खोजने लगा। बाद में मैंने उनकी एक किताब पढ़ी ‘वी इंडियंस’ जिसमें भारतीय होने का पहला लक्षण यह था कि सड़क किनारे, भीड़ में पेशाब करना आना चाहिए और सार्वजनिक तौर पर अपना लिंग खुजाने की पक्की आदत (स्क्रैचिंग जेनाइटल्स इन पब्लिक) होनी चाहिए। बाकी विशेषताएं बड़े लोगों का नाम लेकर काम निकालना, मुंह पर चापलूसी और पीठ पीछे निंदा, ऊपर से धार्मिक अंदर से अनैतिक, खुद को तबाह कर डालने की हद वाली ईर्ष्या आदि बताई गईं थीं।

मैं खुशवंत सिंह की साफगोई और व्यंग्य की तारीफ करता तो कोई न कोई बुद्धिजीवी टाइप आदमी मुझे जरूर बताता कि इसका बाप अंग्रेजों का बहुत बड़ा दलाल था। उसने भगत सिंह के खिलाफ गवाही दी थी। खुद खुशवंत सिंह शराब और अय्याशी में डूबा रहने वाला लेखक है। इसने इमरजेंसी का समर्थन किया था और संजय गांधी को भारत का चे ग्वेवारा बताया था। मैं जिरह करता कि सारी बुराइयों के बावजूद खुशवंत सिंह जिस सच को सामने रखते हैं उसे कैसे झुठलाया जा सकता है/ तभी मेरा ध्यान जाता कि इसका उल्टा भी सच है। यानी यह कि ज्यादातर बुद्धिजीवी नैतिकता झाड़ते हुए तमाम अनैतिक काम करते हैं, इसी कारण उनमें अपने आसपास का सच लिखने का साहस नहीं है।

2009 की बात है, साध्वी उमा भारती ने पार्सल से खुशवंत सिंह को गोमूत्र की शीशी भेजी था ताकि उसका सेवन करके वे अपना दिल-दिमाग शुद्ध कर लें। इसकी वजह यह थी कि उन्होंने 18 अप्रैल को अपने कॉलम में उग्र हिंदुत्व की राजनीति का चेहरा बन चुकीं चार महिलाओं का विश्लेषण किया था। ये नामचीन महिलाएं थीं- उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा, प्रज्ञा ठाकुर और गोधरा फेम मायाबेन कोडनानी। खुशवंत सिंह ने कहा था, ‘इन महिलाओं के भीतर इतना सांप्रदायिक जहर इसलिए भर पाया क्योंकि उन्हें अपने जीवन में संभोग का सुख नहीं मिला। अगर वे यह अनुभव प्राप्त कर लेतीं तो उनके भीतर का जहर निकल जाता और भारतीय समाज शांति से रह पाता।’

खुशवंत सिंह ने जो कहा था, उसे आदमी या औरत के भीतर से जहर निकालने का एकमात्र नुस्खा तो नहीं माना जा सकता। लेकिन इससे ब्रह्मचर्य नामक असंभव कपट की पोल जरूर खुलती है। ब्रह्मचर्य के महिमागान का अंत बलात्कार प्रायोजित रासलीलाओं के बाद जेल की सलाखों के भीतर कैसे होता है, यह समकालीन अरबपति साधुओं के उदाहरण से समझा जा सकता है। खुशवंत सिंह ने बेहद अनैतिक, खिलंदड़ और अंगभीर दिखते हुए भी समाज में गहरे धंसे पाखंड, विद्रूपताओं, कुंठाओं और लालसाओं के बारे में लिखने का साहस किया। तमाम कमजोरियों के बावजूद उस बुड्ढे सरदार में ताकतवर लोगों के खिलाफ सच बोलने की ठसक कहां से आई, इसकी पड़ताल की जानी चाहिए।
 
(ये आर्टिकल लेखक अनिल यादव का है और तस्वीर प्रतीकात्मक है) 
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Blog: तीखे तंज वाला वह मस्त बुड्ढा Blog: तीखे तंज वाला वह मस्त बुड्ढा Reviewed by Rkz Theatre Team on May 20, 2018 Rating: 5

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