ब्लॉग: मैंने आलोक दा का नटसम्राट नहीं देखा

मैंने आलोक दा का नटसम्राट नहीं देखा। देखने का बहोत मन है। इतने बड़े अभिनेता को देखने का मन होगा ही। मैंने सन 2000 में उनके साथ काम किया था। उनकी अभिनय क्षमता और स्पीच सुनकर दंग रह जाता था। आधे अधूरे में जिस तरह वो पांचों किरदार निभाते थे, यक़ीन नहीं होता कि ये वही शख्स है, जो पिछला चरित्र निभा कर गया है। फिर उनके साथ दोबारा अभिनय करने का मौक़ा मिला स्वर्गीय सचिन तिवारी निर्देशित नाटक peasants opera में।

मैं अपने थोड़े बहोत अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ कि थिएटर में उनके म्यार का अभिनेता ढूढना बहोत मुश्किल है, बल्कि नामुमकिन भी कहा जा सकता है। जब सारे मंझे हुए अभिनेता फिल्मों की तरफ़ जा रहे थे तो आलोक दा कह रहे थे कि मैं तो थिएटर ही करूँगा। कितने अभिनेता हैं जो ऐसी बात कहते और निभाते हैं।

सबसे अच्छी बात मुझे उनकी ये लगती है कि वो बहोत सारे लोगों की तरह नहीं हैं ,जो कहते कुछ और करते कुछ हैं। सब कुछ सामने है। अगर उनका राजनैतिक रुझान कहीं है तो हमेशा से है ,जब से मैं उनको जानता हूँ और हमें उसका सम्मान भी करना चाहिए । उनके राजनैतिक झुकाव में कोई दबाव छुपाव नहीं है। वो उन तमाम लोगों से अच्छे हैं जो रंग बदलने में माहिर हैं।

आज कांग्रेसी हैं तो कल भा ज पा में ,और रात को चुपके से कम्युनिस्ट। मैं आरएसएस का विरोधी हूँ, पर अपने गुरुओं-मित्रों का नहीं। हो सकता है नाटक देखने पर नाटक से असहमति रहे ,उनकी राजनैतिक विचारधारा से भी ,किन्तु आलोक दा को स्टेज पर देखने का अलग ही मज़ा है और नाटक को अपनी तरह से करने का उन्हें पूरा हक़ है । हालाँकि नाटक से सम्बंधित सवाल निर्देशक से ही पूछे जाने चाहिए।

राजेश कुमार जी ने नाटक की बहोत सूक्ष्म आलोचना की है ,जिसमें एक राजनैतिक आधार भी है। मैं उस राजनैतिक चेतना का पक्षधर भी हूँ। मेरा ये मान ना है सवाल उठने चाहिए। ये बहोत ज़रूरी भी है। हर रंगकर्मी की एक सामाजिक ,राजनैतिक ज़िम्मेदारी भी है ।साथ ही ये भी याद रखना चाहिए कि हम सब मिलकर ही समाज बनाते हैं। असहमति का मतलब , दुश्मनी कत्तई नहीं हो सकती । ये हम मूढ़ों को समझना चाहिए।

(ये आर्टिकल लेखक के द्वारा लिखा गया है और तस्वीर प्रतीकात्मक है)

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ब्लॉग: मैंने आलोक दा का नटसम्राट नहीं देखा ब्लॉग: मैंने आलोक दा का नटसम्राट नहीं देखा Reviewed by Rkz Theatre Team on June 05, 2018 Rating: 5

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