ब्लॉग: नायक रंगकर्मी थे थिएटर के महान कलाकार हबीब तनवीर

नाट्यशास्त्र में जिस लोकधर्मी रंगधारा की मांग भरत मुनि ने की थी, हमारे समय में हबीब तनवीर ने उसे रचा है। हबीब तनवीर के अनेक पड़ाव रहे हैं। मंचों से उन्होंने अपनी शायरी सुनाई, फिल्मी दुनिया में अपनी क्षमता को परखा, इप्टा में शामिल होकर राजनीतिक सामाजिक दृष्टि के साथ रंगमंच की व्यवस्थित यात्रा उन्होंने शुरू की और "नया थियेटर" तो उनकी सर्वांग रचना है ही।

नया थियेटर और हबीब तनवीर पर्याय रहे हैं। इसी में उनके परिजन हैं, दोस्त हैं और यही उनकी संतानें हैं। हबीब तनवीर किसी एक साधन या माध्यम से ही नही बंधे रहे, बल्कि सभी उपलब्ध साधनों या माध्यमों से अपनी बात कही, अपने बाहर की दुनिया के साथ संवाद करने की और उसे बदलने के लिए हस्तक्षेप की ललक वे रखते थे, और यही ललक हबीब तनवीर की सबसे अलग और उनकी असली पहचान भी बनाती है।

वे अपने गीत-गज़ल और नाटकों से दुनिया बदलने की अपनी तड़फ बयान करते रहे हैं । सूत्रधार नाटक में लिखे गीत की यह पंक्तियां देखिए तो उनकी जमाना बदलने की तड़प का अहसास मिलता है-

"जमाना बदल क्यों न दें संगवारी
जमाना बदल क्यों न दें??
लालच के झोंके, रिश्वत की बरखा
देख बहार का जोर??
चोरी का पेड़ लगाएगा चोर ही
फल और फूल होंगे चोर
चोरी होने लगा दाना-दाना-2
जमाना बदल क्यों न दें संगवारी
जमाना बदल क्यों न दें ।

मै सोचता हूं हबीब साहब ने जितना भी अपने जीवन में किया, उनकी अधूरी रह गई योजनाओं की सूची शायद उससे कही ज्यादा बड़ी और लंबी होगी । हां ! इतना जरूर है कि मुक्तिबोध की कविता की पंक्तियों का यह अफसोस।

और बहुत साल जीना था उन्हें तब शायद अपनी सारी योजनाओं को एक ही जीवन में वे पूरी कर पाते। हबीब साहब की बात जहाँ-जहाँ चलती है, वहाँ-वहाँ, आधुनिक और परंपरागत रंगमंच का एक प्रश्न उपजता है और एक रीछ का बच्चा अचानक गाने लगता "जब हम भी चले साथ चला रीछ का बच्चा"। इस प्रश्न का सत्य उस रीछ के बच्चे के शरीर के बालों ने अपने भीतर छुपा रखा है । उसे जानना अभी बचा हुआ है।

"आधुनिक और परंपरागत" की बहस के सामने हबीब तनवीर का थियेटर जो समाधान पेश करता है, उसके पूरे अर्थ को समझने में अभी समय लगेगा पर हबीब तनवीर पर बात करते हुए यह प्रश्न खुल सके तो एक बहुत जरूरी काम हो रहा होगा।

हबीब तनवीर की लोक से संबद्ध, लोक से परिभाषित होने वाली आधुनिकता, परंपरागत आधुनिकों की आलोचना से हमेशा जूझती रही है, वह नये-पुराने पुरातनपंथियों का निशाना भी बनी है। छत्तीसगढ़ के लोकरंग का एक धड़ा उनका घोर विरोधी रहा है। संभवतः इसी कारण वे दिल्ली से छूटे तो भोपाल में बस गए। इस पर भी कभी अलग से चर्चा जरूर होनी चाहिए।

आधुनिक रंगमंच पढ़े-लिखों का रंगमंच है। उसके कलाकार सुप्रशिक्षित होते हैं। इसके अलग हबीब तनवीर का रंगमंच जिसके अधिकांश कलाकार नाचा से थे जिन्होंने कहीं से विधिवत प्रशिक्षण नही लिया था। और कला का जो भी रूप उन अनपढ़ लोक कलाकारों के पास था वह लोक परंपरागत विरासत से ही उन्हें मिला था।

रंग संसाधन की दृष्टि से देखें तो नया थियेटर और हबीब तनवीर रंगसाधन विपन्न रहे। जो साधन उनके समकालीन अब्रहम अलकाजी को एन एस डी से प्राप्त थे, उस लिहाज से हबीब तनवीर साधनों के अभाव में थियेटर कर रहे थे।

इस अभाव को हबीब साहब ने एक तरह की थियेटर की नई रंगनीति में रूपान्तरित कर रंगमंच में अभिनेता के अभिनय को रंगमंच का मूल तत्व बनाकर प्रस्तुत किया और भारी साज-सज्जा, कास्टियूम की तड़क-भड़क के खर्चे के बोझ से रंगमंच को मुक्त कर दिया।

उन्होंने उपलब्ध संसाधन पर रंगमंच पर बेहतर प्रभाव पैदा करके दिखाया । यह उनका आधुनिकता से भरापूरा रंगमंच था जो आधुनिक रंगमंच के तय शुदा रंगमंच के मानक उपकरण, साधन, प्रपंच से बहुत दूर था । इसलिए यह एक तरह की चुनौती भी थी। - योग मिश्र
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ब्लॉग: नायक रंगकर्मी थे थिएटर के महान कलाकार हबीब तनवीर ब्लॉग: नायक रंगकर्मी थे थिएटर के महान कलाकार हबीब तनवीर Reviewed by Rkz Theatre Team on June 25, 2018 Rating: 5

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