Blog: एक्टिंग कीड़ा या जुनून, जानें मुंबई में स्ट्रगल की सच्ची कहानी


पिछले कुछ दिनों से उसका दिन सुबह जल्दी शुरू होने लगा था। घर की तरह। दिल्ली में ना चाहते हुए भी सुबह आँख खुल जाती थी। क्योंकि वहां 11 बजे के बाद दोपहर होने लगती है, फिर शाम होती है और रात भी। यहाँ मुंबई में सिर्फ दिन और रात होते हैं। और जितने बड़े दिन, उतनी ही बड़ी रातें। यहाँ हर कोई अपने अपने टाइम में जी रहा होता है।

इसलिए कई बार लोगो को टाइम का भी अंदाजा नहीं हो पाता। वो तीन महीने पहले मुंबई आया था, और इस बात का पता लगने में उसे दो महीने लग गए। उसे रात में नींद बहुत देर से आती थी और दिन में 2 बजे लगता था जैसे अभी दिन शुरू ही हुआ हो। इस बीच बड़े भइया का बर्थडे भी भूल गया। भइया उसका मजाक उड़ने से पहले, जब नाराज़ हुए, तब उसे मालूम हुआ। यहां मुंबई में सिर्फ दिन और रात होते हैं। और जितने बड़े दिन, उतनी ही बड़ी रातें।

अक्सर थिएटर करने वाले, मिडल क्लास घरों से आए लड़के, कॉलेज से निकलने के बाद, अपने घरो में आदर्श बालक होने कि एक्टिंग करने लगते है। ऐसा करने से घरवालों के "थिएटर छोड़ों और कोई जॉब पकड़ लो" वाले तानो में थोड़ी गिरावट आती है। इनमे से ज्यादातर लड़के, अपने थिएटर के शुरूआती दिनों में, शाहरुख़, सलमान, अक्षय के फैन होते हैं। फिर इनमे से कुछ, धीरे धीरे एक्टिंग को डेट करते हुए इरफ़ान, नसीर और नवाज़ को दिल दे बैठते हैं। राजकुमार राव के लिए इनके अंदर सॉफ्ट कार्नर होता है।

ये बड़े नाम इन मिडल क्लास लड़कों के अंदर होने वाली रिएक्शन में कैटेलिस्ट का काम करते है, और अनुराग कश्यप जैसे नाम, एंजाइम का। रिएक्शन के शुरू होते ही एनर्जी प्रोडूस होती है, और पता भी नहीं चलता कि उनका प्रोडक्ट अस्तित्व ले चुका है। प्रोडक्ट - एक्टर। इन लड़को को जब खुद के एक्टर हो जाने का पता लगता है। ये अपनी पहली जोरदार परफॉरमेंस, घरवालों के सामने देते है। परफॉरमेंस मात्र एक लाइन कि "पापा! मुझे मुंबई जाना हैँ"। उस दिन भी यही हुआ था, जब उसने अपने घरवालों के सामने परफॉर्म किया, "पापा! मुझे मुंबई जाना है"।

इसके बाद पापा ने वक़्त लेते हुए, अपने एक्टर सुपुत्र कि परफॉर्मन्स से हिल जाने के बाद, ढेर सारी दुविधाओं और सिर्फ एक छोटी सी उम्मीद के साथ कहा,"ठीक हैं जाओ! पैसे वैसे की टेंशन मत लेना। बस मेहनत करना"। यहाँ कैटेलिस्ट मम्मी थी। क्योंकि वो अच्छा एक्टर था, और आदर्श बालक होने की एक्टिंग, मम्मी को नेचुरल एक्टिंग लगी थी। मुंबई वाले दोस्तों को फ़ोन करके, सामान पैक किया और 15 बाद मुंबई चला गया। अपना असली प्रोडक्ट दुनिया को दिखाने की उम्मीद में।

वो एक्टर था। पर मुंबई पहुंच कर एक और नाम उसके साथ जुड़ गया। स्ट्रगलर। मुंबई के आराम नगर, वर्सोवा में जितने घर नहीं मिलते उससे कई ज्यादा स्ट्रगलर मिल जाते है। क्योंकि यहाँ लगभग हर घर में कम से कम 3-4 स्ट्रगलर रहते है। इन 3-4 में से कम से कम 3 एक्टिंग करने नहीं, हीरो बनने आते है। और ये सारे अनडिस्कवर एक्टर्स और हीरो साथ में मिल कर स्ट्रगलर बन जाते है। बचपन में स्ट्रगलर लोगो के किस्से सुन सुन कर, अधिकतर मिडिल क्लास घरो के बच्चे, अपना एक्टर बनने का सपना, बचपन में ही मार देते है।

इसलिए यहाँ आराम नगर में मिलने वाले नब्बे प्रतिशत एक्टर्स और हीरो ठीक- ठाक घरों से आते है। और बाकी के दस प्रतिशत उसकी तरह। इन सभी स्ट्रगलरों को सिर्फ एक ही चीज साथ ला पाती है। ऑडिशंस। वो भी यहाँ आने के बाद से रोज ऑडिशंस देता। फिर देर रात तक दोस्तों के साथ वर्सोवा बीच पर बैठा रहता। क्योंकि यहाँ उसके घर पर, जिसे वो घर नहीं रूम कहता, उसकी आदर्श बालक वाली एक्टिंग देखने के लिए कोई नहीं था। और हाँ! यहाँ स्ट्रगलर को स्ट्रगलर कहना गाली समझा जाता है।

मुंबई आने से पहले, उसके दिमाग में स्ट्रगलर लोगो के नाम पर, पतले शरीर के, हल्की दाढ़ी और साधारण कपड़ो वाले लोग आया करते थे। जिनका चेहरा देख के दया आ जाये। लेकिन यहाँ आराम नगर के ऑडिशन में दिखने वाले स्ट्रगलर, उसके दिमाग वाले स्ट्रगलर से बिलकुल उलट थे। बॉडी, स्किन टाइट टी-शर्ट और कंधे चढ़ाये, धूप का चश्मा पहन कर ऑडिशन की स्क्रिप्ट पढ़ने वाले। जिनको देख के अपनी शक्ल में कमिया नज़र आने लगे।
इस बीच जब कोई पतले शरीर का, हल्की दाढ़ी और साधारण कपड़ो वाला वहां आ जाए, तो ये लोग उसे एक्टर समझने लगते। लेकिन वो इन सब के बीच में कही आता था।मतलब न ही उसने बॉडी बनायीं थी और न ही उसकी शक्ल देख के दया आती थी। इसलिए ऑडिशन के "फिट-नॉट फिट" में ज्यादातर नॉट फिट होता। और बिना किसी परेशानी के अगले ऑडिशन की तरफ बाद जाता। क्यूंकि एक बार पियूष मिश्रा ने कहा था "मुंबई आये हो! एक्टर हो! तो काम मिलेगा। लेकिन जब तक मिलेगा, तब तक एक्टर रह पाओगे क्या।"। वो एक्टर था, और एक्टर ही रहना चाहता था। इसलिए सोच चुका था कि पहला काम मिलने के बाद ही घर जायेगा।

जो एक्टर्स पियूष मिश्रा की कही इस बात को सीरियसली नहीं लेते, उनमे से कई कास्टिंग डायरेक्टर हो जाते हैं। कास्टिंग डायरेक्टर हो जाने की शुरुआत, एक्टर्स के कास्टिंग असिस्टेंट हो जाने से होती है। जो वो इसलिए हो जाता है, ताकि अपने टाइप का रोल देख के खुद भी ऑडिशन दे सके। लेकिन कास्टिंग का डाटा जमा करते करते, अपने अभिनेता को खो देता है। डाटा से याद आया, कई बार ऑडिशन, सिर्फ डाटा जमा करने के लिए ही होते हैं।
ऐसी हालत में, ये एक्टर से कास्टिंग असिस्टेंट बन चुके लोग, स्ट्रगलर को दी झूटी उम्मीद से फर्ट्रेट घर आते हैं, माल फूकते हैं, और सो जाते हैं। उसे भी कई लोगो ने ये सलाह दी कि काम ना मिलने तक कास्टिंग असिस्टेंट या कास्टिंग डायरेक्टर बन जाये। पर उसने मना कर दिया। क्योंकि उसके साथ रहने वाला एक लड़का रोज रात Frustate हो कर, माल फूक कर, सो जाया करता था।

मुंबई आये हर एक एक्टर की इच्छा एक फिल्म होती है। पर वो एड के ऑडिशन में ही फसा रह जाता है। इस उम्मीद के साथ की अगर कुछ नहीं हुआ तो टीवी कर लेंगे। इस बीच कई एक्टर्स की एक छोटी उम्मीद यूट्यूब चैनल से भी लग जाती है। जिससे वो कई बार किराया, राशन, घर की एक ट्रिप निकाल लेते है। उसका भी यही हाल था। दिन भर ऑडिशन के लिए भागते भागते, उसे कई बार लगता कि इस भागादौड़ी में कही उसके अंदर का एक्टर मर न जाये।

दो महीने बिना कोई काम मिले निकल जाने के बाद उसने सोचा कि यहाँ वापस थिएटर में जाया जा सकता है। पर वहाँ पहुंच कर पता चला की यहाँ, थिएटर जॉइन करना तो आसान है, लेकिन स्टेज पर चढ़ने में लोगों को 2 साल लग जाते हैं। और कुछ थिएटर के बड़े नाम तो स्टेज पर खड़े होने के पैसे भी ले लेते है। उसका थिएटर करने ने ख्याल इसी पॉइंट पर सुसाइड कर लिया।

वो इन दिनों थोड़ा मायुस हो जाता था। घर से पहली बार इतने दिनों के लिए दूर था। घर की याद आती थी पर, घर से आयी वीडियो कॉल उठाने में हिचकिचाता था। खाने पीने की सुध न होने से थोड़ा पतला हो गया था। रात में नींद बहुत देर से आती थी और दिन में 2 बजे लगता था जैसे अभी दिन शुरू ही हुआ है। बड़े भइया का बर्थडे भूल जाने पर, जब भइया नाराज़ हुए, तो उनके सामने फूट कर रो पड़ा। फिर भइया ने उसका मज़ाक उड़ाते हुए कहा," इस तरह रोओगे, तो टीवी में बहुओं वाले रोल मिलेंगे।

पिछले कुछ दिनों से उसका दिन सुबह जल्दी शुरू होने लगा था। घर की तरह। उठ कर थिएटर में सीखी एक्सरसाइज करता, तैयार होता और आराम नगर के लिए निकल जाता। इस दौरान, बीच बीच में फ़ोन निकाल कर टाइम देख लेता। आज कल उसे टाइम का अंदाजा रहने लगा था। फिर शाम को उन्ही दोस्तों के साथ वर्सोवा बीच पर बैठा रहता। ऐसे ही किसी दिन दोस्तों से बाते करते वक़्त उसे एक कॉल आया।

कॉल एक यूट्यूब चैनल वालों की तरफ से था, जिसके लिए उसने बहुत दिन पहले ऑडिशन दिया था। कॉल खत्म होते ही उसके चेहरे पर बहुत बड़ी सी मुस्कराहट थी। मुंबई में उसका पहला काम। कॉल टाइम 9 बजे का था, तो बिना किसी देरी के घर जा कर सो गया। अगले दिन जल्दी उठा। बॉडी, आवाज, आँखे, एक्सप्रेश्न की जितनी भी एक्सरसाइज उसे मालूम थी, सब कर डाली। तैयार हुआ और मेट्रो स्टेशन की ऒर निकल पड़ा। यहाँ मुंबई में दिल्ली जैसा सिर्फ मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियाँ है। प्लेटफार्म पर आ कर मेट्रो में चढ़ते ही, सब मुंबई हो जाता है।

वो ठीक 9 बजे लोकेशन पर पहुँचा। वह पहुंचते ही उसे एड ने स्क्रिप्ट थमा दी। स्क्रिप्ट काफी एवरेज थी और उसका करैक्टर काफी छोटा। पर उसने इस पर ध्यान नहीं दिया। क्यूंकि वो मुंबई में पहली बार, स्ट्रगलर ना होते हुए, एक एक्टर था। उसका सीन आने में अभी टाइम था। वो बैठ कर अपने करैक्टर में घुसने की कोशिश करने लगा। करैक्टर तैयार हो चुका था, पर सीन शुरू होने में अभी भी काफी वक़्त था।

बीच बीच में एड आ कर उसका हाल पूछ जाते। सेट पर जब एक्टरr बोर हो रहा हो, तो कॉस्टम वाले लोग उसके बेस्ट फ्रेंड्स हो जाते है। लंच हो चुका था, पर उसका सीन नहीं आया। अब तक वो कस्टम दद्दा को फ्रेंड रिक्वेस्ट भी भेज चुका था। थोड़ी देर बाद डायरेक्टर उससे मिलने आया। उसी की उम्र का लड़का था। उससे दो तीन सवाल किये, और लाइन करने को कहा। बीच बीच में डायरेक्टर ने उसे जबरदस्ती डायलॉग्स गलत तरीके से लेने को कहा। वो उस डायरेक्टर की क्षमता पर पूरा शक कर चुका था, पर इस समय ये मायने नहीं रखता था। क्योंकि उसे याद था " डायरेक्टर ऑल वेज राइट"। उसने डायरेक्टर के कहे मुताबिक डायलॉग्स बदले और फिर से 3 घंटे इंतज़ार किया।

अब उसकी ऊर्जा धीरे धीरे कम होने लगी थी, पर ये महसूस होते ही, वो एंग्री में आ जाता। फिर आखिरकार एड ने उसे आवाज लगायी। वो सेट पहुँचा। सब लोग पहले से तैयार थे। डायरेक्टर ने उसे कुछ समझाया, और फिर एक्शन कॉल लेनी शुरू की। आज पहली बार वो अपना प्रोडक्ट दुनिया को दिखाने जा रहा था।
वहाँ अपने को-एक्टर के साथ खड़ा वो, अपने करैक्टर में घुस चुका था। डायरेक्टर की आवाज दी, एक्शन की आवाज आते ही, वो अपने डायलाग लेना शुरू ही करता कि, उससे पहले ही सब लोग हँसने लगें। जोर जोर से हँसने लगें। सब लोग आ आ कर उससे गले मिल रहे थे। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। पर यूट्यूब वीडियो का शूट खत्म हो चुका था। ये एक प्रैंक वीडियो था। प्रैंक उसके साथ हुआ था।

वो लोग उसके साथ खड़े हो कर, कैमरे में उस यूट्यूब चैनल को सब्सक्राइब करने की बात कर रहे थे। और वो, अच्छा एक्टर होने के बावजूद, क्या रिएक्शन दें, समझ नहीं पा रहा था। इसलिए उन लोगो के साथ बीच बीच में मुस्कुरा देता। थोड़ी देर में रात होने वाली थी।

वहाँ से निकल कर, खुद को, आज जो हुआ, उसका जवाब देने की कोशिश करते करते वो मेट्रो स्टेशन तक आ गया। उसने आँखे बंद करके सीढ़ियां चढ़ी। प्लेटफार्म पर आ कर मेट्रो में चढ़ते ही, सब मुंबई हो जाता है। मेट्रो में बैठ जाने के बाद भी उसके पास वो जवाब या रिएक्शन नहीं था।

इस वीडियो के आने के बाद लोग उसे एक्टर समझने लगेंगे। बिना उसका प्रोडक्ट देखे। वो अपना पहला काम कर चुका है। पर घर नहीं जा सकता। यूट्यूब चैनल वालों ने स्टार्ट अप होने के कारण, उसे पैसे नहीं दिए। निराश या खुश होने के लिए, कोई भी कारण काम नहीं कर रहा था।

इस बीच उसकी नज़र मेट्रो की खिड़की पर गयी। वो खिड़की से बाहर देखने लगा।उसे मुंबई में पहली बार शाम होती नज़र आयी। खिड़की से बाहर घरों को देखते हुए, उसे लगा, की जैसे वो करोलबाग़ वाली ब्लू लाइन मेट्रो में खड़ा हों। उसकी निचली पलकों के अंदर जमा होता पानी, इस शाम को और ज्यादा शाम बना रहा था। उसने आँखे बंद की। और सोचने लगा। शायद थोड़ी देर बाद राजीव चौक आएगा और वो मेट्रो बदल कर घर चला जाएगा।

(ये आर्टिकल एक्टर निखिल विजय द्वारा लिखा गया है और तस्वीर प्रतीकात्मक है)
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Blog: एक्टिंग कीड़ा या जुनून, जानें मुंबई में स्ट्रगल की सच्ची कहानी Blog: एक्टिंग कीड़ा या जुनून, जानें मुंबई में स्ट्रगल की सच्ची कहानी Reviewed by Rkz Theatre Team on July 01, 2018 Rating: 5

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